Tuesday, 23 April 2013

तोड़ती पत्थर by Suryakant Tripathi 'Nirala'

वह तोड़ती पत्थरदेखा मैंने इलाहाबाद के पथ पर --वह तोड़ती पत्थर ।

कोई न छायादारपेड़, वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार;श्याम तन, भर बँधा यौवन,गुरु हथौड़ा हाथकरती बार बार प्रहार;सामने तरु - मालिका, अट्टालिका, प्राकार ।

चड़ रही थी धूपगरमियों के दिनदिवा का तमतमाता रूप;उठी झुलसाती हुई लूरुई ज्यों जलती हुई भूगर्द चिनगी छा गयीप्रायः हुई दुपहर,वह तोड़ती पत्थर ।

देखते देखा, मुझे तो एक बारउस भवन की ओर देखा छिन्न-तारदेखकर कोई नहींदेखा मुझे उस दृष्टि सेजो मार खा रोयी नहींसजा सहज सितार,सुनी मैंने वह नहीं जो थी सुनी झंकार ।एक छन के बाद वह काँपी सुघर,दुलक माथे से गिरे सीकार,लीन होते कर्म में फिर ज्यों कहा --"मैं तोड़ती पत्थर"

Monday, 22 April 2013

और मेरे हिस्से बस दुःख है ,
 फूल मूक सा रहा , ऊपर रब की और देखा,
रब ने फिर प्रतिउत्तर दिया ,
जब जब माली ने पौधा सींचा ,
उसने कुछ पल ये सोचा ,
कि क्या  ये मुसीबत है?
मेरे सर पे बस धूप की छत है ,
मालिक मेरा सोया पड़ा ,उसको न चिंता न परवाह ,
फिर रोटी कि पोटली उसने खोली ,
 सूखी पर मीठी मीठी ,
फिर जठर पे उसने हाथ रखा , 
मेरा फिर शुक्रिया किया 
फिर से उसने पौधा सींचा ,
उस के उन कड़वाहट  के पलो से काँटा
 और मीठे पलो से ये फूल उगा,
इसलिए गलती नहीं कोई तुम्हारी ,
कभी कभी माँ बाप कि गलती भुगतनी  पड़ जाती है संतानों को भी,
एक बात है सची सची,  मीठी होती है रोटी मेहनत क़ी! !

Saturday, 11 June 2011

छूट चुकी है रेल


जा चुके है सब और वही खामोशी छायी है,
पसरा है हर ओर सन्नाटा, तन्हाई मुस्कुराई है,
छूट चुकी है रेल ,
चंद लम्हों की तो बात थी,
क्या रौनक थी यहॉं,
जैसे सजी कोई महफिल खास थी,
अजनबी थे चेहरे सारे,
फिर भी उनसे मुलाक़ात थी,
भेजी थी किसी ने अपनाइयत,
सलाम मे वो क्या बात थी,
एक पल थे आप जैसे क़ौसर,
अब बची अकेली रात थी,
चलो अब लौट चलें यहॉं से,
छूट चुकी है रेल
ये अब गुज़री बात थी,
उङते काग़ज़, करते बयान्‍,
इनकी भी किसी से
दो पल पहले मुलाक़ात थी,
बढ़ चले क़दम,
कनारे उन पटरियों
कहानी जिनके रोज़ ये साथ थी,
फिर आएगी दूजी रेल,
फिर चीरेगी ये सन्नाटा
जैसे जिन्दगी से फिर मुलाक़ात थी,
फिर लौटेंगे और,
भारी क़दमों से,जैसे
कोई गहरी सी बात थी,
छूट चुकी है रेल,
अब सिर्फ काली स्याहा रात थी |

युँ तो बहुत कुछ है, पास मेरे फिर भी कुछ कमी सी है




युँ तो बहुत कुछ है

पास मेरे फिर भी कुछ कमी सी है

घिंरा हूँ चारो तरफ़ मुस्कुराते चेहरो से

फिर भी जिन्दगी में उजाले भरने वाली उस मुस्कुराहट की कमी सी है

दिख रही है पहचान अपनी ओर उठते हर नज़र में

फिर भी दिल को छु लेने वालि उस निगाह की कमी सी है 

गुँज़ता है हर दिन नये किस्सो, कोलाहल और ठहाको से

फिर भी कानो में गुनगुनाति उस खामोशी कि कमी सी है 

बढ़ रहे है कदम मेरे पाने को नयी मन्ज़िलें

फिर भी इन हाथो से छुट चुके उन नरम हाथो की कमी सी ह 

पुराने शहरों के मंज़र निकलने लगते हैं


पुराने शहरों के मंज़र निकलने लगते हैं
ज़मीं जहाँ भी खुले घर निकलने लगते हैं

मैं खोलता हूँ सदफ़ मोतियों के चक्कर में
मगर यहाँ भी समन्दर निकलने लगते हैं

हसीन लगते हैं जाड़ों में सुबह के मंज़र
सितारे धूप पहनकर निकलने लगते हैं

बुरे दिनों से बचाना मुझे मेरे मौला
क़रीबी दोस्त भी बचकर निकलने लगते हैं

बुलन्दियों का तसव्वुर भी ख़ूब होता है
कभी कभी तो मेरे पर निकलने लगते हैं

अगर ख़्याल भी आए कि तुझको ख़त लिक्खूँ
तो घोंसलों से कबूतर निकलने लगते हैं